फॉर्म की बाढ़, नामांकन की सुस्ती और अंतिम घड़ी की रणनीति ने बढ़ाया सत्ता संघर्ष का ताप
विश्रामपुर (पलामू)
विश्रामपुर नगर परिषद चुनाव अब सामान्य चुनावी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह स्थानीय सत्ता पर कब्जे की खुली जंग का रूप ले चुका है। नामांकन के चौथे दिन नगर परिषद कार्यालय परिसर जिस तरह सियासी अखाड़े में तब्दील दिखा, उसने साफ संकेत दे दिया कि इस बार की लड़ाई सिर्फ चेहरे नहीं, बल्कि नियंत्रण, वर्चस्व और भविष्य की राजनीति को लेकर है।
अध्यक्ष पद के लिए सात प्रत्याशियों का एक ही दिन मैदान में उतरना यह बताने के लिए काफी है कि कुर्सी को लेकर अंदरखाने बेचैनी चरम पर है। सुलेखा प्रिया, चंपा शुक्ला और निवर्तमान अध्यक्ष हलीमा बीवी जैसे नामों का आमने-सामने आना यह दर्शाता है कि यह चुनाव नए बनाम पुराने नेतृत्व, सत्ता बनाम असंतोष और विश्वसनीयता बनाम प्रशासनिक थकान की सीधी टक्कर बन चुका है।
खासतौर पर निवर्तमान अध्यक्ष का फिर से नामांकन इस बात का संकेत है कि सत्ता पक्ष किसी भी कीमत पर अपनी पकड़ ढीली करने के मूड में नहीं है, जबकि नए चेहरों की एंट्री यह दिखाती है कि नगर की जनता में बदलाव की बेचैनी अब खुलकर राजनीतिक शक्ल ले रही है।
आक्रामक सियासी संकेत फॉर्म बिक्री और नामांकन के अंतर में छिपा है। अध्यक्ष पद के लिए अब तक 35 फॉर्म बिकना, लेकिन केवल 10 नामांकन दाखिल होना, यह साफ बताता है कि अधिकांश दावेदार आखिरी पल तक सौदेबाज़ी, समर्थन और शक्ति संतुलन का इंतजार कर रहे हैं।
यह स्थिति बताती है कि विश्रामपुर की राजनीति फिलहाल घोषित नहीं, प्रबंधित हो रही है।
वार्ड पार्षद पद के लिए 146 फॉर्म की बिक्री और केवल 39 नामांकन यह दर्शाते हैं कि असली लड़ाई वार्डों में छिपी है। यही वह स्तर है जहां मतों का गणित, जातीय समीकरण और स्थानीय प्रभाव तय होगा। अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता इन्हीं वार्डों से होकर गुजरता है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अंतिम दो दिनों में नामांकन का विस्फोट होगा। उस वक्त साफ हो जाएगा कि कौन प्रत्याशी जनता के भरोसे मैदान में है और कौन सिर्फ दबाव की राजनीति के तहत मैदान में उतरा है।
विश्रामपुर की जनता इस बार केवल विकास के वादे नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और नई दिशा की मांग कर रही है। ऐसे में यह चुनाव तय करेगा कि नगर परिषद पुरानी सत्ता की परछाईं में चलेगी या नए नेतृत्व की आंधी में दिशा बदलेगी।
यह चुनाव शांत नहीं रहने वाला।
आखिरी दिन का नामांकन हीं बताएगा कि विश्रामपुर में कुर्सी बचेगी या बदलेगी।

