विश्रामपुर (पलामू )
दिन ढलते ही लालगढ़ की फिजा बदलने लगती है। जैसे-जैसे अंधेरा गहराता है, कोयल नदी का सीना गाड़ियों की आवाज से कांप उठता है। रात के सन्नाटे को चीरती बालू लदी गाड़ियों की कतारें इस बात की गवाही देती हैं कि यहां कोई छोटा-मोटा खेल नहीं, बल्कि संगठित तरीके से अवैध उत्खनन और परिवहन का कारोबार चल रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, हर रात करीब पंद्रह गाड़ियां नदी से बालू लेकर निकलती हैं। हैरत की बात यह है कि यह सब कुछ ऐसे होता है मानो किसी अदृश्य संरक्षण का कवच इन्हें मिला हुआ हो। गाड़ियां मुख्य रास्तों से गुजरती हैं, थाने के आसपास से भी निकलती हैं, लेकिन रोकने वाला कोई नहीं दिखता।
इलाके में एक और कहानी खूब चर्चा में है। कहा जाता है कि थाना की “अनकही व्यवस्था” के तहत तीन गाड़ी मालिकों को ही गाड़ियों की निगरानी का जिम्मा दे दिया गया है। अब वही तय करते हैं कि किसकी गाड़ी नदी तक पहुंचेगी और किसकी नहीं। अगर कोई नया या बाहर का गाड़ी मालिक बालू ढुलाई की कोशिश करे तो उसे यह कहकर रोक दिया जाता है कि ऊपर से आदेश है।
गांव की चौपालों और चाय दुकानों पर लोग दबी जुबान से यह भी कहते हैं कि कुछ गाड़ी मालिक थाना के इतने करीबी हैं कि सुबह-शाम थाने तक चाय-नाश्ते की व्यवस्था उन्हीं के यहां से पहुंचती है। जो एक अच्छे रिश्ते को और भी प्रगाढ़ बना रहा है।
कोयल नदी हर रात अपना सीना छलनी होते देखती है, गाड़ियां धूल उड़ाते हुए निकल जाती हैं, लेकिन जिम्मेदारों की खामोशी लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल छोड़ जाती है
क्या यह सब बिना संरक्षण के संभव है, या फिर लालगढ़ की रातों में सचमुच सिस्टम सो जाता है?

