प्रकृति और भाई-बहन के अटूट बंधन का उत्सव

झारखंड की मिट्टी में भीनी खुशबू है—यह खुशबू सिर्फ धान की बालियों या महुए के फूलों से नहीं आती, बल्कि इसके कण-कण में आदिवासी संस्कृति का वह गहरा रिश्ता रचा-बसा है, जो प्रकृति के साथ आत्मीय और अगाध है। इसी आत्मीयता का सबसे सजीव उदाहरण है करम पर्व .भादो मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात जब आकाश में चाँद नई आभा से चमकता है, तब गाँव-गाँव की औरतें, बच्चें – बूढ़े और लड़के-लड़कियाँ अखरा में इकट्ठा होते हैं। मांदर और नगड़ा की गूँज के बीच जब पाँव ताल से ताल मिलाते हैं, तो लगता है मानो पूरी धरती संगीत में बोल उठी हो। इस आनंद और भक्ति से ओतप्रोत रात को ही करम देव की पूजा होती है। यह पर्व भाई-बहन के आत्मिक रिश्ते का प्रतीक है, प्रकृति की गोद को प्रणाम है और सामूहिक संस्कृति की धड़कन है।

प्रकृति की पूजा : जीवन का आधार
आदिवासी जीवन-दर्शन में प्रकृति कभी ‘संसाधन’ नहीं रही; वह तो माँ है, दाता है, पालनकर्ता है। पेड़-पौधे यहाँ सिर्फ हरियाली नहीं बल्कि देवत्व हैं। करम पर्व इसी आदर्श का ज्वलंत उदाहरण है।

पूरे रीति-रिवाज से जब करम डाली मिट्टी में रोपी जाती है, तो वह सिर्फ लकड़ी की डाल नहीं रहती, बल्कि श्रद्धा और जीवन की डोर बन जाती है। उसके चारों ओर नृत्य करते हुए युवतियाँ और महिलाएँ गीत गाती हैं जिसमें गाँव की खुशहाली, भाई की लंबी उम्र और धरती की उर्वरता की प्रार्थना समाहित होती है।

प्रकृति और मानव के इस संवाद को देखकर लगता है कि करम पर्व एक तरह से हमें यह याद दिलाता है कि मनुष्य तभी सुखी हो सकता है, जब वह प्रकृति को आदर और अपनापन दे।

भाई-बहन के प्रेम का पर्व
करमा पर्व का दूसरा गहरा आयाम है भाई-बहन का स्नेह। बहनें उपवास रखकर करम देव से अपने भाइयों की लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं। जिस तरह राखी भाई-बहन के रिश्ते को धागे से जोड़ती है, उसी तरह करम पर्व हरियाली से भरे करम वृक्ष की डाली से इस रिश्ते को अमर कर देता है।

यह सच है कि त्योहार केवल रिवाजों से नहीं चलते; वे समाज की भावनाओं और संबंधों को जीवित रखते हैं। करम पर्व भाई-बहन के प्रेम की वही जीवित निशानी है, जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी इस बंधन को और अधिक पवित्र बनाया है।

करमा-धरमा की अमर कथा
इस पर्व के हृदय में एक लोककथा धड़कती है—करमा और धरमा की कथा। यह केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन का गहरा संदेश है।

कहते हैं, बहुत समय पहले करमा और धरमा नामक दो भाई रहते थे। करमा, अपनी पत्नी की अधार्मिक प्रवृत्तियों से आहत होकर घर छोड़ देता है। उसके जाते ही गाँव और प्रकृति मानो अपने सौंदर्य और शक्ति को खो देते हैं। नदी सूख जाती है, पेड़ के फल सड़ जाते हैं, लोग कष्ट में डूब जाते हैं। धरमा जब भाई को खोजते-खोजते अंततः रेगिस्तान में पहुँचता है, तो पाता है कि तपती धूप में करमा का शरीर फोड़े और पीड़ा से भरा है।

धरमा का हृदय भर आता है, वह भाई से वापस चलने की प्रार्थना करता है। लेकिन करमा का मन घर की अपवित्रता से दुखी है। तभी बहन की प्रार्थना, उसका अटूट विश्वास और करम डाली की पूजा इस कहानी में नया मोड़ ले आते हैं। करमा घर लौटता है, और घर लौटते ही संसार की सारी विसंगतियाँ दूर हो जाती हैं—नदी का जल भर जाता है, फल पकने लगते हैं और सुख-समृद्धि लौट आती है।

यह कथा बताती है कि जब तक धर्म और नीति से विचलन होगा, तब तक जीवन में अशांति बनी रहेगी। और जब विश्वास, अपनापन और प्रकृति का आदर होगा, तब जीवन में मधुरता और खुशहाली लौट आएगी।

करम महापर्व का संदेश–
करमा पर्व कोई साधारण त्योहार नहीं है; यह हमारे जीवन के लिए गहरे संदेश समेटे हुए है—

प्रकृति का सम्मान करो – जल, जंगल और ज़मीन ही जीवन का असली आधार हैं।

भाई-बहन का स्नेह बचाओ – यह रिश्ते हमारे जीवन की आत्मिक ताकत हैं।

सामाजिकता को जीवित रखो – करम पर्व सामूहिक उत्सव है, यह सिखाता है कि खुशी और संपन्नता हमेशा बाँटने पर बढ़ती है।

धर्म और नीति का मार्ग अपनाओ – अन्यथा व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर अशांति फैल जाएगी।

करम पर्व सिर्फ एक दिन का पर्व नहीं है; यह झारखंड और आदिवासी संस्कृति की आत्मा है। यह पर्व हमें उस पुरखों की परंपरा से जोड़ता है, जिसने सबसे पहले प्रकृति का उपकार देखा, उसे पूजा और उसका धन्यवाद किया।

आज जब आधुनिक जीवन की दौड़ में हम प्रकृति से दूर हो रहे हैं, जब रिश्तों की मधुरता कमज़ोर पड़ रही है, तब करम पर्व हमें अपनी जड़ों की याद दिलाता है। वास्तव में यह पर्व हमें सिखाता है कि—

अगर धरती हरी-भरी रहेगी, अगर रिश्तों का बंधन जीवित रहेगा, तभी मानव जीवन समृद्ध और खुशहाल हो सकेगा।

करम एक लोकपर्व भर नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा दिखाने वाला दार्शनिक संदेश है, जिसे हर पीढ़ी को न केवल जानना चाहिए, बल्कि अपने जीवन में उतारना भी चाहिए।

अनिल अमिताभ पन्ना
(सोशल ऐक्टिविस्ट व युवा आदिवासी नेता)

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